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News Highlights

बुजुर्गों को अब बस अदालतों का सहारा है

मैं अपने बेटे से परेशान हूं...। 60 हजार रुपए किराया मिलता है और 60 रुपए भी मुझे नहीं देता है...। हम पति-पत्नी कभी रिश्तेदारों का दिया खाना खा लेते हैं तो कभी रो कर रात बिता लेते हैं...। अपने ही घर में बेगाने हो कर रह गए हैं हम...। अधिकारियों के पास भी हम लोग गए मगर हुआ कुछ नहीं...। अब किसके पास जाएं, नहीं सूझ रहा है। लोग कह रहे कि अदालत के पास जाओ पर उसके लिए भी रास्ता तो मालूम होना चाहिए । इतना कहते - कहते पटना सिटी के जयप्रकाश जी का गला रुंध गया।

वास्तव में अपनी तरह की कोई इकलौती घटना नहीं है। ऐसा ही मामला पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट में सामने आया। 75 से अधिक वर्ष के बूढ़े माँ-बाप को घर निकाल बाहर करने वाले मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने वकील से पूछा कि बेटा कहाँ है, तो उसने कहा कि वह शिरडी दर्शन को गए हैं।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि लोग कितनी अजीब पूजा करते हैं। एक तरफ अपने मां-बाप को घर से निकाल देते हैं और फिर पूजा करने शिरडी आदि पूजा-स्थलों पर जाते हैं। वकील ने कोर्ट को बताया कि बेटे को संयुक्त हिन्दू परिवार के कानून के तहत सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। इस पर कोर्ट ने वकील को कड़ी फटकार लगाते हुए संयुक्त हिन्दू परिवार का मतलब समझाते हुए कहा कि जब आप अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं तो आपका संपत्ति में कोई हक नहीं हो सकता।

समाज में यह आम धारणा बनती जा रही है कि बुजुर्ग फालतू प्राणी हैं। उनकी उपेक्षा होने लगी है। अनुपयोगिता का अहसास एक वृद्ध को जहां गतिशील सामाजिक जीवन से अलग कर रख देता है, वहीं उसके सामने सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने की समस्या भी आ खड़ी होती है।

ऐसा नहीं है कि समाज में ऐसे परिवार बिल्कुल नहीं हैं जहां वृद्धों को पूरा सम्मान मिलता हो लेकिन ऐसे परिवारों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। हां, यह भी संभव है कि कुछ तथाकथित आधुनिक लोग जो एक ओर संयुक्त परिवार के लाभ तो लेना चाहते हैं लेकिन उसके विखंडन का दोष बुजुर्गों की रोक टोक पर डालकर अपना दामन बचाना चाहते हों लेकिन वे अपने बचपन को याद नहीं करना चाहते जब वे हमारी हर जिद्द पूरी करने को माता-पिता तैयार रहते थे। ऐसे लोग क्यों नहीं समझना चाहते कि बुढ़ापा एक तरह से बचपन का पुनरागमन ही तो है। आज जब वे शरीर से अशक्त और मन से बेचैन हैं तो क्या हम अपने कर्तव्य भुला दें?

जीवन का अखिरी चरण है। परिवार में ऐसा वातावरण बनाएं जिससे घर में बुजुर्गों को सम्मान मिल सके। इस स्थिति में सभी को पहुंचना है, इस बात का अहसास सभी नवयुवकों को करना चाहिए। वृद्धों के पास अनुभवों, संस्मरणों, स्मृतियों के विशाल भण्डार होते हैं। उनके अनुभव हमारे लिए अमूल्य धरोहर हैं जिन्हें संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है। साथ ही सरकार का भी यह परम कर्तव्य है कि वृद्धावस्था पैंशन, उनके पुनर्वास की योजनाएं आदि बनाकर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करे।

जीवन में सबसे उत्तम कर्म है माता-पिता की सेवा करना। माता-पिता की सेवा भगवान की पूजा करने के बराबर है। महात्मा चाणक्य ‘वृद्ध सेवाय विज्ञा’ अर्थात वृद्धजनों की सेवा से विशेष ज्ञान एवं विज्ञान की प्राप्ति होती है का उद्घोष करते हैं। हमारे शास्त्रों में माता-पिता और गुरु की बड़ी महिमा बताई गई है। जो तीनों का आदर, सम्मान व सेवा करके उन्हें प्रसन्न करता है, वह तीनों लोकों को जीत लेता है।

औसत आयु में वृद्धि के साथ ही, देश में बूढ़ों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। जब तक उनका शरीर चलता है, वे भार नहीं होते पर अशक्त होने या विपन्न होने की दशा में वे परिवार पर भार बन जाते हैं। परिवारों के टूटने पर दादा-दादी, माता -पिता तक का बंटवारा होने लगा है। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को लेकर भी अक्सर कलह होने लगती है। यह विचारणीय है कि आखिर हमारी संवेदनाएं इतनी मृतप्रायः क्यों और कैसे हो गईं।

-अशोक भाटिया

कैसे दिखें आप सुंदर?

मैं अपने बेटे से परेशान हूं...। 60 हजार रुपए किराया मिलता है और 60 रुपए भी मुझे नहीं देता है...। हम पति-पत्नी कभी रिश्तेदारों का दिया खाना खा लेते हैं तो कभी रो कर रात बिता लेते हैं...। अपने ही घर में बेगाने हो कर रह गए हैं हम...। अधिकारियों के पास भी हम लोग गए मगर हुआ कुछ नहीं...। अब किसके पास जाएं, नहीं सूझ रहा है। लोग कह रहे कि अदालत के पास जाओ पर उसके लिए भी रास्ता तो मालूम होना चाहिए । इतना कहते - कहते पटना सिटी के जयप्रकाश जी का गला रुंध गया।

वास्तव में अपनी तरह की कोई इकलौती घटना नहीं है। ऐसा ही मामला पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट में सामने आया। 75 से अधिक वर्ष के बूढ़े माँ-बाप को घर निकाल बाहर करने वाले मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने वकील से पूछा कि बेटा कहाँ है, तो उसने कहा कि वह शिरडी दर्शन को गए हैं।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि लोग कितनी अजीब पूजा करते हैं। एक तरफ अपने मां-बाप को घर से निकाल देते हैं और फिर पूजा करने शिरडी आदि पूजा-स्थलों पर जाते हैं। वकील ने कोर्ट को बताया कि बेटे को संयुक्त हिन्दू परिवार के कानून के तहत सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए। इस पर कोर्ट ने वकील को कड़ी फटकार लगाते हुए संयुक्त हिन्दू परिवार का मतलब समझाते हुए कहा कि जब आप अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं तो आपका संपत्ति में कोई हक नहीं हो सकता।

समाज में यह आम धारणा बनती जा रही है कि बुजुर्ग फालतू प्राणी हैं। उनकी उपेक्षा होने लगी है। अनुपयोगिता का अहसास एक वृद्ध को जहां गतिशील सामाजिक जीवन से अलग कर रख देता है, वहीं उसके सामने सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने की समस्या भी आ खड़ी होती है।

ऐसा नहीं है कि समाज में ऐसे परिवार बिल्कुल नहीं हैं जहां वृद्धों को पूरा सम्मान मिलता हो लेकिन ऐसे परिवारों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। हां, यह भी संभव है कि कुछ तथाकथित आधुनिक लोग जो एक ओर संयुक्त परिवार के लाभ तो लेना चाहते हैं लेकिन उसके विखंडन का दोष बुजुर्गों की रोक टोक पर डालकर अपना दामन बचाना चाहते हों लेकिन वे अपने बचपन को याद नहीं करना चाहते जब वे हमारी हर जिद्द पूरी करने को माता-पिता तैयार रहते थे। ऐसे लोग क्यों नहीं समझना चाहते कि बुढ़ापा एक तरह से बचपन का पुनरागमन ही तो है। आज जब वे शरीर से अशक्त और मन से बेचैन हैं तो क्या हम अपने कर्तव्य भुला दें?

जीवन का अखिरी चरण है। परिवार में ऐसा वातावरण बनाएं जिससे घर में बुजुर्गों को सम्मान मिल सके। इस स्थिति में सभी को पहुंचना है, इस बात का अहसास सभी नवयुवकों को करना चाहिए। वृद्धों के पास अनुभवों, संस्मरणों, स्मृतियों के विशाल भण्डार होते हैं। उनके अनुभव हमारे लिए अमूल्य धरोहर हैं जिन्हें संजोकर रखना हमारा कर्तव्य है। साथ ही सरकार का भी यह परम कर्तव्य है कि वृद्धावस्था पैंशन, उनके पुनर्वास की योजनाएं आदि बनाकर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करे।

जीवन में सबसे उत्तम कर्म है माता-पिता की सेवा करना। माता-पिता की सेवा भगवान की पूजा करने के बराबर है। महात्मा चाणक्य ‘वृद्ध सेवाय विज्ञा’ अर्थात वृद्धजनों की सेवा से विशेष ज्ञान एवं विज्ञान की प्राप्ति होती है का उद्घोष करते हैं। हमारे शास्त्रों में माता-पिता और गुरु की बड़ी महिमा बताई गई है। जो तीनों का आदर, सम्मान व सेवा करके उन्हें प्रसन्न करता है, वह तीनों लोकों को जीत लेता है।

औसत आयु में वृद्धि के साथ ही, देश में बूढ़ों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। जब तक उनका शरीर चलता है, वे भार नहीं होते पर अशक्त होने या विपन्न होने की दशा में वे परिवार पर भार बन जाते हैं। परिवारों के टूटने पर दादा-दादी, माता -पिता तक का बंटवारा होने लगा है। उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को लेकर भी अक्सर कलह होने लगती है। यह विचारणीय है कि आखिर हमारी संवेदनाएं इतनी मृतप्रायः क्यों और कैसे हो गईं।

-अशोक भाटिया

जब महिलायें नौकरी में हों

कुछ महिलाओं में एक विशेष प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, अहम् की प्रवृत्ति। वे पुरूष जो नौकरी में नहीं है और उनकी पत्नी नौकरी में है, उनमें से अधिकांश औरतें अपने पति को नीचा दिखाने में प्रयासरत रहती है। ऐसी परिस्थिति में पुरूष कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप या तो वे पत्नी की हर जायज-नाजायज बातों को सहते रहते हैं या तलाक देने की बात करने लगते हैं।

चंूकि पत्नी-पति का रिश्ता आपसी सहयोग और तालमेल से ही चलता है, अतः आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने से किसी को भी लाभ नहीं होगा। इसलिए ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए पति के साथ सहयोगात्मक रवैय्या अपनाना चाहिए। पति की जरूरतों और भावनाओं का हमेशा ख्याल रखना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना जरूरी है।

- पति से ऐसी कोई बात न कहें जिससे उसकी भावनाओं को ठोस पहुंचे।

- कार्यालय में अपने सहयोगियों से एक निश्चित दूरी बनाये रखें।

- पुरूष सहयोगियों को घर लाने से पहले पति की अनुमति लें और उन्हें उसी समय पर घर लायें जब पति घर पर मौजूद हो।

- किसी सहयोगी के साथ बिना पति से कहे कहीं भी पिकनिक या रेस्तरां में जाने का कार्यक्रम न बनायें।

- घर यदि देर से आयें तो पति पर झल्लायें नहीं बल्कि देर होने का कारण बतायें।

- घरेलू कार्यों में प्यार से पति की मदद मांगें और छुट्टी के दिन घूमने-फिरने का कार्यक्रम बनायें।

उपरोक्त छोटी-छोटी सावधानियां बरतने से आपके और उनके बीच की अघोषित दूरियां मिट जाएंगी। दोनों एक-दूसरे के साथ सहयोग करें तो गृहस्थी आनंदमय होगी। अतः औरतों को चाहिए कि अहम् की भावना को त्यागकर पति को मित्रावत् सहयोग कर एक सफल दंपति होने की खुशी प्राप्त करें।

-राजु कुमार ‘नीरा‘

सेबी के नए नियमों से आईपीआई की आएगी बहार

मुंबई, (वेबवार्ता)। कारोबारियों एवं शेयर बाजारों को सेबी द्वारा हाल ही में दुरस्त की गई आईपीओ प्रक्रिया से प्राथमिक बाजारों में सुधार आने की उम्मीद है क्योंकि सेबी के उपायों से निवेशकों के शिकायतों तेजी से घटेंगी।

उन्हें नए आईपीओ नियमों से बाजार में छोटे निवेशकों की भागीदारी कम से कम 25 प्रतिशत तक बढ़ने की उम्मीद है। वर्तमान में शेयर बाजार में करीब दो करोड़ छोटे निवेशक हैं और पिछले साल बाजार में तेजी के बावजूद इनकी संख्या में कोई खास बढोतरी नहीं हुई।

प्रतिभूति रजिस्ट्री सेवाएं देने वाली लिंक इनटाइम के मुख्य परिचालन अधिकारी हरेन मोदी ने कहा कि शेयर बाजार की वृद्धि को ध्यान में रखते हुए सेबी के नए उपायों से अगले एक साल में छोटे निवेशकों की भागीदारी कम से कम 25 प्रतिशत बढ़ाने में मदद मिलेगी।

आईपीओ नियमों को दुरस्त करते हुए सेबी ने पिछले मंगलवार को आईपीओ के लिए अभिदान चेक मुक्त करने एवं सूचीबद्धता के लिए लगने वाला समय घटाकर छह दिन कर दिया।

लिवर के लिए घातक है फास्ट फूड

जो लोग बाजार से फास्ट फूड खाने के अधिक शौकीन हैं वे सावधान हो जाएं क्योंकि एक नवीनतम शोध में पाया गया है कि फास्ट फूड जैसे बर्गर, पिज़ा आदि न केवल मोटापा बढ़ाते हैं बल्कि हमारे लिवर के लिए भी घातक हैं।

इस शोध के लिए स्वीडिश शोधकर्ताओं ने 18 पतले स्वस्थ छात्रों का चयन किया और उन्हें दिन में दो बार फास्ट फूड रेस्टोरेंट में खाना खाने को कहा गया। साथ ही निष्क्रिय जीवन शैली को भी अपनाने को कहा गया। भोजन में प्रायः ये लोग हैरबर्गर और ऐसे खाद्य पदार्थ खाते थे जिनमें सेचुरेटेड एनीमल फैट भारी मात्रा में हो। इनके भोजन का खर्च शोधकर्ताओं द्वारा ही वहन किया गया।

शोध में पाया गया कि अधिकतर छात्रों का वजन औसत 14 पौंड बढ़ गया और उनकी कमर के नाप में 2.6 इंच वृद्धि हुई। छात्रों के रक्त की जांच करने पर पाया गया कि इन छात्रों के रक्त में लिवर एंजाइम का स्तर एक सप्ताह में ही काफी बढ़ गया था। शोधकर्ताओं का कहना है कि कभी-कभी ये पदार्थ खाने तो ठीक हैं किन्तु इन्हें नियमित खाना लिवर के लिए काफी हानिकारक हो सकता है।

- अशोक गुप्त

 

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